Swami Vivekananda Ka Jeevan aur Unke Motivational Speech - DearHindi.com – Sarkari Yojana Updates, Finance & Loans, Health Facts, Tech News.

Followers

11 January, 2026

Swami Vivekananda Ka Jeevan aur Unke Motivational Speech

Swami Vivekananda Ka Jeevan aur Unke Motivational Speech

स्वामी विवेकानंद : जीवन परिचय एवं प्रेरणादायक भाषण


स्वामी विवेकानंद भारत की आध्यात्मिक भूमि पर जन्मे ऐसे महापुरुष थे जिन्होंने न केवल देश को आत्मगौरव का बोध कराया, बल्कि पूरे विश्व में भारतीय संस्कृति, वेदांत और मानवता का संदेश फैलाया। उनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ था। उनके बचपन का नाम नरेंद्रनाथ दत्त था। उनके पिता विश्वनाथ दत्त एक प्रतिष्ठित वकील थे और माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक, संस्कारवान और स्नेहमयी महिला थीं। बचपन से ही नरेंद्रनाथ असाधारण प्रतिभा के धनी थे। उनकी बुद्धि तीव्र थी, आवाज ओजस्वी थी और मन में सत्य को जानने की प्रबल जिज्ञासा थी।


नरेंद्रनाथ को बचपन से ही ईश्वर के अस्तित्व पर प्रश्न करने की आदत थी। वे अक्सर पूछते थे – “क्या आपने ईश्वर को देखा है?” यही प्रश्न उन्हें आगे चलकर महान संत रामकृष्ण परमहंस तक ले गया। रामकृष्ण परमहंस के सान्निध्य में रहकर नरेंद्रनाथ को आत्मज्ञान की अनुभूति हुई। गुरु के मार्गदर्शन में उन्होंने समझा कि ईश्वर केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि हर जीव में विद्यमान है। गुरु रामकृष्ण की मृत्यु के बाद नरेंद्रनाथ ने संन्यास धारण किया और वे स्वामी विवेकानंद कहलाए।


स्वामी विवेकानंद ने संपूर्ण भारत का भ्रमण किया। उन्होंने देश की गरीबी, अज्ञान, छुआछूत और सामाजिक कुरीतियों को बहुत करीब से देखा। वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि भारत की आत्मा धर्म और अध्यात्म में है, लेकिन उसका पतन अज्ञान और आत्महीनता के कारण हुआ है। उन्होंने युवाओं को जागृत करने का संकल्प लिया। उनका मानना था कि जब तक युवा शक्ति मजबूत नहीं होगी, तब तक देश का उद्धार संभव नहीं है।


1893 में स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका के शिकागो शहर में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भाग लिया। जैसे ही उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत “मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों” शब्दों से की, पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। उस ऐतिहासिक भाषण ने भारत को विश्व मंच पर गौरव दिलाया। उन्होंने वेदांत, सहिष्णुता और सर्वधर्म समभाव का ऐसा संदेश दिया जिसने पश्चिमी दुनिया को गहराई से प्रभावित किया।


स्वामी विवेकानंद का भाषण केवल शब्दों का समूह नहीं था, बल्कि वह आत्मा की पुकार थी। उन्होंने कहा कि सभी धर्म सत्य की ओर ले जाने वाले अलग-अलग मार्ग हैं। किसी एक धर्म को श्रेष्ठ और दूसरे को हीन मानना मानवता के विरुद्ध है। उन्होंने भारत को अध्यात्म का गुरु और पश्चिम को भौतिक विज्ञान का गुरु बताया और दोनों के समन्वय की बात कही।


स्वामी विवेकानंद युवाओं को संबोधित करते हुए कहते थे कि उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए। वे कमजोर मानसिकता के घोर विरोधी थे। उनका कहना था कि “तुम स्वयं अपने भाग्य के निर्माता हो।” वे चाहते थे कि भारत का हर युवा आत्मविश्वास से भरा हो, निर्भीक हो और अपने भीतर छिपी शक्ति को पहचाने।


वे कहते थे कि शिक्षा केवल नौकरी पाने का साधन नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण का माध्यम होनी चाहिए। ऐसी शिक्षा जो मनुष्य को निडर, स्वावलंबी और मानवतावादी बनाए। उनके अनुसार, सेवा ही सच्चा धर्म है। गरीबों, शोषितों और पीड़ितों की सेवा करना ईश्वर की सच्ची पूजा है।


स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, जिसका उद्देश्य मानव सेवा और आध्यात्मिक जागरण था। आज भी यह मिशन शिक्षा, स्वास्थ्य और समाज सेवा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। स्वामी विवेकानंद का जीवन त्याग, तपस्या और राष्ट्रसेवा का अद्भुत उदाहरण है।


उनका कहना था कि जब तक भारत का अंतिम व्यक्ति शिक्षित, स्वस्थ और सम्मानित नहीं होगा, तब तक राष्ट्र का विकास अधूरा है। वे जाति, धर्म और भाषा के नाम पर विभाजन के सख्त खिलाफ थे। उनके लिए मानवता सबसे बड़ा धर्म थी।


स्वामी विवेकानंद का निधन 4 जुलाई 1902 को मात्र 39 वर्ष की आयु में हो गया, लेकिन इतने कम समय में उन्होंने जो कार्य किया, वह सदियों तक मानवता को मार्गदर्शन देता रहेगा। उनका जीवन यह सिखाता है कि यदि संकल्प मजबूत हो और उद्देश्य महान हो, तो एक व्यक्ति भी इतिहास बदल सकता है।


आज भी स्वामी विवेकानंद के विचार युवाओं में नई ऊर्जा भरते हैं। उनका संदेश हमें सिखाता है कि स्वयं पर विश्वास रखो, कर्म करो और मानवता की सेवा को अपना धर्म बनाओ। वे केवल एक संत नहीं थे, बल्कि एक विचार, एक क्रांति और एक प्रेरणा थे।


स्वामी विवेकानंद का जीवन और उनका भाषण आज के समय में पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। जब दुनिया भौतिकता, तनाव और भटकाव से जूझ रही है, तब विवेकानंद हमें आत्मचिंतन, साहस और सेवा का मार्ग दिखाते हैं। उनका अमर संदेश यही है कि मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसका आत्मविश्वास है और सबसे बड़ा धर्म मानवता।

No comments:

Post a Comment