इंदौर में ज़हरीला पानी, 18 मौतें: कांग्रेस का पीएम मोदी पर बड़ा हमला
मध्य प्रदेश के इंदौर से सामने आई ज़हरीले पानी की घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। इस दर्दनाक हादसे में अब तक 18 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि कई लोग गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती हैं। बताया जा रहा है कि प्रभावित इलाकों में सप्लाई किए गए पानी में जहरीले तत्व मिले, जिससे लोगों की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी। इस घटना के बाद न सिर्फ प्रशासन पर सवाल उठे हैं, बल्कि राजनीतिक माहौल भी पूरी तरह गरमा गया है।
घटना सामने आने के बाद स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश देखने को मिला। कई परिवारों ने आरोप लगाया कि उन्होंने प्रशासन को पहले ही पानी की गुणवत्ता को लेकर शिकायतें की थीं, लेकिन समय रहते कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। अचानक उल्टी, दस्त, पेट दर्द और बेहोशी की शिकायतों के बाद लोग अस्पताल पहुंचने लगे। देखते ही देखते मौतों का आंकड़ा बढ़ता गया, जिसने स्वास्थ्य व्यवस्था और नगर निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
इस मामले में कांग्रेस ने केंद्र और राज्य सरकार दोनों को कठघरे में खड़ा कर दिया है। कांग्रेस नेताओं ने इसे सरकारी लापरवाही और सिस्टम की नाकामी बताया है। पार्टी का आरोप है कि “डबल इंजन सरकार” होने के बावजूद आम लोगों को साफ और सुरक्षित पीने का पानी तक उपलब्ध नहीं कराया जा सका। कांग्रेस का कहना है कि अगर समय रहते पानी की जांच और सप्लाई सिस्टम की निगरानी की गई होती, तो इतने बड़े पैमाने पर जानें नहीं जातीं।
कांग्रेस ने सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी हमला बोला है। पार्टी नेताओं का कहना है कि पीएम मोदी हर मंच से विकास, स्वच्छ भारत और हर घर जल योजना की बात करते हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही है। इंदौर जैसी स्मार्ट सिटी में अगर लोग ज़हरीला पानी पीने को मजबूर हैं, तो यह सरकार के दावों पर बड़ा सवाल है। कांग्रेस ने मांग की है कि इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच हो और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।
वहीं राज्य सरकार और प्रशासन ने शुरुआती जांच में पानी की सप्लाई लाइन में गड़बड़ी और सीवेज के पानी के मिक्स होने की आशंका जताई है। अधिकारियों का कहना है कि प्रभावित इलाकों में पानी की सप्लाई तुरंत बंद कर दी गई है और टैंकरों के जरिए साफ पानी पहुंचाया जा रहा है। साथ ही, बीमार लोगों के इलाज के लिए अस्पतालों में विशेष इंतजाम किए गए हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब इंदौर को देश के सबसे स्वच्छ शहरों में गिना जाता है, तो ऐसी लापरवाही कैसे हो गई?
यह घटना सिर्फ इंदौर तक सीमित नहीं है, बल्कि देशभर में पानी की गुणवत्ता और सप्लाई सिस्टम पर बहस छेड़ देती है। कई शहरों और गांवों में आज भी लोग दूषित पानी पीने को मजबूर हैं, जिससे हर साल हजारों लोग बीमार पड़ते हैं। सरकार की योजनाएं कागज़ों पर भले ही मजबूत दिखती हों, लेकिन ज़मीनी स्तर पर उनके क्रियान्वयन में बड़ी खामियां नजर आती हैं।
राजनीतिक तौर पर देखें तो कांग्रेस इस मुद्दे को आने वाले चुनावों से जोड़कर सरकार पर दबाव बना रही है। पार्टी इसे आम जनता से जुड़े बुनियादी मुद्दे के रूप में पेश कर रही है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता है, जिसकी जिम्मेदारी सरकार को लेनी होगी। उन्होंने मृतकों के परिजनों को उचित मुआवजा और स्थायी समाधान की मांग भी की है।
दूसरी ओर, बीजेपी ने कांग्रेस के आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया है। बीजेपी नेताओं का कहना है कि सरकार स्थिति को संभालने में पूरी तरह जुटी है और बिना जांच पूरी हुए राजनीतिक आरोप लगाना गलत है। उनका दावा है कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा और भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों, इसके लिए कड़े कदम उठाए जाएंगे।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या देश में बुनियादी सुविधाओं को लेकर सरकारें वाकई गंभीर हैं? साफ पानी जीवन की सबसे जरूरी जरूरत है। अगर इसी में लापरवाही होगी, तो विकास और स्मार्ट सिटी जैसे दावे खोखले नजर आने लगते हैं। इंदौर की यह त्रासदी सरकार, प्रशासन और सिस्टम – तीनों के लिए एक बड़ी चेतावनी है।
अंत में, इंदौर में ज़हरीले पानी से हुई मौतें सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, बल्कि वे परिवार हैं जिनकी दुनिया उजड़ गई। इस घटना से सबक लेकर अगर ठोस और स्थायी कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में ऐसी घटनाएं दोहराई जा सकती हैं। अब देखना यह है कि सरकार इस मामले को सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रखती है या वाकई ज़मीनी स्तर पर बदलाव लाने के लिए ठोस कार्रवाई करती है।


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