NSE और BSE में क्या अंतर है? जानिए स्थापना, टेक्नोलॉजी, लिक्विडिटी, Sensex vs Nifty और निवेश के लिए कौन बेहतर है।
NSE और BSE भारत के दो प्रमुख स्टॉक एक्सचेंज हैं, जहाँ शेयर, बॉन्ड, डेरिवेटिव्स और अन्य वित्तीय साधनों की खरीद–फरोख्त होती है। दोनों का उद्देश्य निवेशकों को एक सुरक्षित और पारदर्शी प्लेटफॉर्म देना है, लेकिन उनकी स्थापना, कार्यप्रणाली, तकनीक और लोकप्रियता में कुछ महत्वपूर्ण अंतर हैं। नीचे NSE और BSE के बीच अंतर को विस्तार से पैराग्राफ में समझाया गया है।
BSE (Bombay Stock Exchange) भारत का सबसे पुराना स्टॉक एक्सचेंज है, जिसकी स्थापना वर्ष 1875 में हुई थी। यह न केवल भारत बल्कि एशिया का भी सबसे पुराना स्टॉक एक्सचेंज माना जाता है। इसकी शुरुआत मुंबई में “The Native Share & Stock Brokers’ Association” के रूप में हुई थी। लंबे समय तक BSE भारत का एकमात्र प्रमुख एक्सचेंज रहा, इसलिए यहाँ लिस्टेड कंपनियों की संख्या काफी अधिक है। आज भी BSE पर 5,000 से अधिक कंपनियाँ सूचीबद्ध हैं, जो इसे दुनिया के सबसे बड़े एक्सचेंजों में से एक बनाती हैं। इसके प्रमुख इंडेक्स को Sensex कहा जाता है, जिसमें 30 बड़ी और मजबूत कंपनियाँ शामिल होती हैं।
वहीं NSE (National Stock Exchange) की स्थापना 1992 में हुई थी और इसका संचालन 1994 से शुरू हुआ। NSE को आधुनिक और तकनीकी रूप से उन्नत एक्सचेंज के रूप में बनाया गया था। NSE ने भारत में पहली बार पूरी तरह इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग सिस्टम की शुरुआत की, जिससे देशभर के निवेशक बिना फिजिकल ट्रेडिंग फ्लोर के ऑनलाइन ट्रेड कर सके। NSE का प्रमुख इंडेक्स Nifty 50 है, जिसमें 50 बड़ी कंपनियाँ शामिल हैं। NSE ने कम समय में ही अपनी तेज़, पारदर्शी और निवेशक–अनुकूल प्रणाली के कारण काफी लोकप्रियता हासिल कर ली।
तकनीक के स्तर पर NSE को BSE से आगे माना जाता है। NSE शुरू से ही इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग पर आधारित रहा, जबकि BSE ने बाद में अपनी ट्रेडिंग प्रणाली को डिजिटल किया। NSE की ट्रेडिंग स्पीड तेज़ होने के कारण हाई–फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग और बड़े वॉल्यूम के सौदे यहाँ अधिक होते हैं। यही कारण है कि आज के समय में NSE पर ट्रेडिंग वॉल्यूम BSE की तुलना में कहीं ज्यादा है। डेरिवेटिव्स मार्केट (Futures & Options) में तो NSE का लगभग एकाधिकार है।
लिक्विडिटी के मामले में भी NSE, BSE से आगे है। लिक्विडिटी का मतलब है कि किसी शेयर को कितनी आसानी से खरीदा या बेचा जा सकता है। NSE में अधिक निवेशक सक्रिय रहते हैं, जिससे यहाँ बायर्स और सेलर्स की संख्या ज्यादा होती है। इसके कारण स्प्रेड कम रहता है और निवेशकों को बेहतर प्राइस डिस्कवरी मिलती है। हालांकि, कुछ छोटे और मिड–कैप शेयर ऐसे हैं जिनमें BSE पर भी अच्छी लिक्विडिटी देखी जाती है।
लिस्टिंग की दृष्टि से BSE पर कंपनियों की संख्या ज्यादा है, लेकिन NSE पर प्रमुख और अधिक सक्रिय कंपनियाँ लिस्टेड होती हैं। कई कंपनियाँ दोनों एक्सचेंज पर लिस्टेड होती हैं, जिससे निवेशक अपनी सुविधा के अनुसार किसी भी प्लेटफॉर्म से ट्रेड कर सकते हैं। कीमतों में आमतौर पर ज्यादा अंतर नहीं होता क्योंकि आर्बिट्राज के कारण दोनों एक्सचेंजों के दाम लगभग समान रहते हैं।
निवेशक प्रोफाइल की बात करें तो रिटेल निवेशक, ट्रेडर्स और बड़े संस्थागत निवेशक (FII और DII) अधिकतर NSE को प्राथमिकता देते हैं, खासकर डेरिवेटिव्स और इंट्राडे ट्रेडिंग के लिए। वहीं BSE को लंबे समय के निवेश और स्मॉल–कैप कंपनियों के लिए जाना जाता है। BSE का SME प्लेटफॉर्म भी काफी लोकप्रिय है, जहाँ छोटी कंपनियाँ पूंजी जुटाती हैं।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि NSE और BSE दोनों ही भारत के शेयर बाजार की रीढ़ हैं। BSE अपनी ऐतिहासिक विरासत और अधिक लिस्टेड कंपनियों के लिए जाना जाता है, जबकि NSE आधुनिक तकनीक, ज्यादा ट्रेडिंग वॉल्यूम और बेहतर लिक्विडिटी के लिए प्रसिद्ध है। एक निवेशक के लिए दोनों में से किसी एक को चुनना उसकी निवेश रणनीति, ट्रेडिंग स्टाइल और उद्देश्य पर निर्भर करता है। सही जानकारी और समझ के साथ दोनों एक्सचेंज निवेश के अच्छे अवसर प्रदान करते हैं।


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